दिवाली पर कविता / गीत – Diwali Par Kavita / Geet

दिवाली पर कविता / गीत – Diwali Par Kavita / Geet

diwali anmol gyan dipawali kavitaआनंदमय जीवन की कला
:: फैलता ही रहे प्यार दीपावली ::
हो विजय आज भी यार दीपावली, दिल बने प्रेम-आगार दीपावली ।
रोज ही अब उगे एक सूरज नया, फैलता ही रहे प्यार दीपावली ।
खुश रहें लोग सब रौशनी हो यहाँ, शोभते हों गले हार दीपावली ।
आँधियों से बचें प्रेम की वादियाँ, सींचते ही रहो क्यार दीपावली ।
नेह ‘अंजान’ से तुम बनाकर रखो, है बहुत राह दरकार दीपावली ।
:: दीपावली गीत ::
दीवाली के दिये जले पर, घर अपने अँधियारा है ।
कोई आख़िर मुझे बताये, हक़ ये किसने मारा है ।…
शनै-शनै निगले है’ ग़रीबी, आफ़त गला मरोड़ रही ।
हम पर ये इल्ज़ाम लगा है, उनसे अपनी होड़ रही ।
रूखा-सूखा खाकर पलते, वैभव सिर्फ तुम्हारा है ।
कोई आख़िर मुझे बताये, हक़ ये किसने मारा है ।….
प्राण हमारे मुँह को आते, लहू में’ विपदा दौड़ रही ।
हाय-हाय बेदर्द विधाता, कमर ग़रीबी तोड़ रही ।
दुनिया वाले फिर भी जलते, क्या अपराध हमारा है ?
कोई आख़िर मुझे बताये, हक़ ये किसने मारा है ।…..
खाट सिरहाने बँधी लक्ष्मी, आँखें हमें तरेर रही ।
अपनी फूटी क़िस्मत देखो, पाल जनम का बैर रही ।
नारायण भी हमको छलते, तम ने पैर पसारा है ।
कोई आख़िर मुझे बताये, हक़ ये किसने मारा है ।….

– दीपक चौबे ‘अंजान’ –

:: 1. वर्तमान परिदृष्य और मेरी तीन कुंडलियां ::
दीवाली अर्पित करो उन वीरों के नाम ।
जिनका जीवन आ गया मात्रृभूमि के काम ।
मातृभूमि के काम प्राण का दीप जलाया ।
सैनिक होने का पुनीत कर्तव्य निभाया ।
बिखर गए सिन्दूर हो गए आंगन खाली ।
उजडे़ कितनी कोख हुयी तब शुभ दीवाली ।।
:: 2 ::
दीवाली है द्वार पर हालत है बेहाल ।
करता हर पल श्रम अथक रहता है कंगाल ।
रहता है कंगाल देश का भाग्यविधाता ।
नेता नारा नीति उसे कुछ समझ न आता ।
देशबन्धु जब तक न रहे हर घर खुशहाली ।
जबतक दुखी किसान न होगी शुभ दीवाली ।।
:: 3 ::
दीवाली पर हम नहीं सकें पटाखे दाग ।
घुसपैठी रखते रहें उपवन में नित आग ।
उपवन में नित आग रोहिंगया बांग्लादेशी ।
काश्मीरी पंडित घर में ही हुए विदेशी ।
छठ पूजा पर रोक मोहर्रम पर दे ताली ।
महामहिम यदि कहें मनावो तब दीवाली ।।

– © योगी देशबन्धु –

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