ग़ज़ल – Ghazal

ग़ज़ल – Ghazal

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ग़ज़ल : Ghazal
:: मेरा महबूब है महबूब कैसा है बताऊँ क्या ::
कोई मुश्किल बिना मुश्किल के हल हो जाय, मुश्किल है ।
रात होने के पहले आज,कल हो जाय मुश्किल है ॥
मेरा महबूब है महबूब कैसा है बताऊँ क्या ।
जोत क्या, चाँद सूरज का बदल हो जाय मुश्किल है ॥
आसमानी किताबों में कही हर बार सच्ची है ।
है आसाँ समझ लेना पर अमल हो जाय मुश्किल है ॥
जिसे पैदा किया पाला बनाया हो किसी काबिल ।
उसी औलाद से माँ की टहल हो जाय मुश्किल है ॥
मेरे महबूब के ही हुश्न का साया है ये दुनिया ।
न हों महबूब से बातें , ग़ज़ल हो जाय मुश्किल है ॥
है सबका रूप अपना रंग अपना और निकहत भी ।
तेरे जैसा ‘कँवल’ कोई कँवल हो जाय मुश्किल है ॥
:: ओस के कण रश्मियों से ले रहे हैं सात रंग ::
आ गये खंजन कमलिनी ताल में इठला रही है ।
हो रही बरखा बिदा लो अब शरद ऋतु आ रही है ॥
ओस के कण रश्मियों से ले रहे हैं सात रंग ।
हो रहे हैं दिन छरहरे रात कुछ गदरा रही है ॥
खेत बोये जा रहे फिर, धान पक कर कट गये ।
चक्र जीवन मृत्यु का यह ऋतु हमें समझा रही है ॥
धो दिया मेघों ने है आकाश को कुछ इस तरह ।
चन्द्रमा है गौरश्यामल चाँदनी इठला रही है ॥
खिल रहे दिन में ‘कमल’ तो रात हँसती कमलिनी ।
मत्त है महमह पवन अलिमणडली पगला रही है ॥
:: एक ग़ैरमुरत्तब ग़ज़ल ::
इतना न करम करना साकी कमजर्फ़ है महफिल बहकेगी ।
लबरेज हुये जो पैमाने छलकेगी गुलाबी छलकेगी ॥
कूवत है कहाँ किसमें इतनी रख पाये कली को पोशीदा ।
जब बादेशबा सहला देगी पत्तों से निकलकर महकेगी ॥
है शेख़ की शेख़ी मस्जिद तक नासेह की नसीहत नासेह तक ।
मैख़ाने मे गर ये आजायें सब गाँठ की बाँधी खिसकेगी ॥
माना की यही था किस्मत में पत्थर के सनम से टकराना ।
आहों पे भरोसा कायम है हर हाल में मूरत दरकेगी ॥
मस्जिद से पियासा मैं निकला मैख़ाने गया जी भर के पिया ।
अब दिल से जहनियत की चादर उड़ जायेगी यातो सरकेगी ॥
लेने दो उन्हें बारिश का मजा उम्मीद घटाओं से है ‘कँवल’।
वो आके गले लग जायेंगे जब जोर से बिजली चमकेगी ॥

– © कमला पति पाण्डेय ‘कमल’ –

:: बात करते हैं बदज़बानों की । कैसी नीयत है बेईमानों की ::
बात करते हैं बदज़बानों की । कैसी नीयत है बेईमानों की ।
मातहत हो गए हैं हावी अब, कुछ न चलती है हुक़्मरानों की ।
पत्थरों से न टूटे गी हिम्मत, सरहदों पर डटे जवानों की ।
बेवकूफ़ों पे राज करने को, फिर ज़रूरत है कुछ सयानों की ।
एक दूजे पे थूकते हैं अब, क्या ज़रूरत उगालदानों की ।
एक टुकड़ा ज़मी नसीब नहीं, बात करते हैं आसमानों की ।
बेच डाले हैं घर बुज़ुर्गों के, सबको ख़ाहिश निजी मकानों की ।

– © Manjull Manzar ‘Lucknowi’ –

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3 Comments

  1. Manjull Manzar Lucknowi

    Thanks a lot…

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